“खेत बचाओ अभियान” के तहत किसानों को दी वैज्ञानिक खेती और संतुलित उर्वरक उपयोग की जानकारी

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बीकानेर 15 जून। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा संचालित राष्ट्रव्यापी “खेत बचाओ अभियान” के अंतर्गत भा.कृ.अनु.प.-केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान, बीकानेर द्वारा सोमवार को नोरंगदेसर एवं गुसाईसर गांवों में किसान जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। कार्यक्रमों में किसानों को उर्वरकों के संतुलित उपयोग, प्राकृतिक खेती, सरकारी योजनाओं के लाभ तथा वैज्ञानिक सलाह के माध्यम से खेती को सुरक्षित और लाभकारी बनाने के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी गई।कार्यक्रम के दौरान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. धुरेन्द्र सिंह, डॉ. डी.के. समादिया, डॉ. एस.आर. मीना एवं डॉ. रमेश कुमार ने किसानों से संवाद करते हुए विभिन्न बागवानी फसलों में संतुलित खाद एवं उर्वरकों के उपयोग, प्राकृतिक खेती तथा एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन के महत्व पर प्रकाश डाला। वैज्ञानिकों ने बताया कि मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता को बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाना आवश्यक है।कार्यक्रम की शुरुआत में डॉ. एस.आर. मीना ने उपस्थित किसानों का स्वागत करते हुए “खेत बचाओ अभियान” के विभिन्न आयामों और इसकी आवश्यकता के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे फसल उत्पादन में संतुलित उर्वरकों के उपयोग को प्राथमिकता दें और प्राकृतिक व जैविक खेती की ओर कदम बढ़ाएं, ताकि भूमि की उर्वरता लंबे समय तक सुरक्षित रह सके।इस दौरान डॉ. धुरेन्द्र सिंह ने किसानों को विभिन्न बागवानी फसलों में जैव-उर्वरकों के उपयोग की सलाह दी और बताया कि इससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है। उन्होंने बागवानी फसलों के मूल्य संवर्धन के महत्व को समझाते हुए कहा कि समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाकर खेतों की सेहत को बेहतर बनाया जा सकता है।गुसाईसर गांव में आयोजित कार्यक्रम में संस्थान की दूसरी टीम ने किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, प्राकृतिक खेती और सरकारी योजनाओं की जानकारी दी। इस अवसर पर डॉ. डी.के. समादिया ने सब्जी वर्ग की बागवानी फसलों जैसे काचरी, काकड़िया, ग्वारफली एवं खेजरी की वैज्ञानिक खेती पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने उन्नत किस्मों के चयन और उचित पोषण व्यवस्था के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग से पौष्टिक खाद्य पदार्थों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।वहीं, डॉ. रमेश कुमार ने बेलपत्र एवं नींबू वर्गीय फसलों में जैविक और प्राकृतिक खेती की उपयोगिता पर जानकारी दी। उन्होंने किसानों को मौसम की विपरीत परिस्थितियों से निपटने के उपाय बताते हुए बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली (ड्रिप इरिगेशन) और उचित मात्रा में फर्टिगेशन अपनाने की सलाह दी।कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया और वैज्ञानिकों से खेती से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा कर समाधान प्राप्त किए। वैज्ञानिकों ने किसानों को आधुनिक तकनीकों एवं प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग के माध्यम से खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने का संदेश दिया।

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